Sadiyo se Tum Meri - 2 in Hindi Love Stories by Pooja Singh books and stories PDF | सदियों से तुम मेरी - 2

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सदियों से तुम मेरी - 2

सुबह की हल्की धूप खिड़की से होकर दिव्या के कमरे में फैल रही थी। अलार्म बजने से पहले ही उसकी आँख खुल गई थी। वह कुछ पल यूँ ही छत को देखती रही, जैसे किसी अधूरे सपने को याद करने की कोशिश कर रही हो। उसे फिर वही सपना आया था—घने जंगल, बहता पानी और दूर कहीं चमकती हुई दो सुनहरी आँखें। यह सपना पिछले कई सालों से उसका पीछा कर रहा था, लेकिन हर बार जागते ही उसके टुकड़े धुंधले हो जाते थे।
दिव्या ने सिर झटककर खुद को सामान्य किया और बिस्तर से उठ गई। उसके कमरे की दीवारों पर किताबों की शेल्फ लगी थी, जिनमें ज्यादातर साइंस और हिस्ट्री की किताबें थीं। वह एक साधारण मिडिल क्लास परिवार की लड़की थी। उसके पिता सरकारी दफ्तर में काम करते थे और माँ गृहिणी थीं। घर का माहौल हमेशा सादगी और प्यार से भरा रहता था।
रसोई से आती चाय और पराठों की खुशबू ने उसे जल्दी तैयार होने पर मजबूर कर दिया। वह नीचे आई तो माँ पहले से ही नाश्ता तैयार कर चुकी थीं। माँ ने मुस्कुराकर पूछा, “आज जल्दी उठ गई, सब ठीक तो है?”
दिव्या हल्की मुस्कान के साथ बोली, “हाँ माँ, बस नींद जल्दी खुल गई।”
पिता अखबार पढ़ते हुए बोले, “आज कॉलेज में कोई खास क्लास है क्या?”
“नहीं पापा, बस प्रोजेक्ट सबमिशन है,” दिव्या ने जवाब दिया और जल्दी-जल्दी नाश्ता खत्म करने लगी।
दिव्या अपने कॉलेज की होशियार और शांत स्वभाव की छात्रा थी। उसे भीड़-भाड़ और ज्यादा शोर पसंद नहीं था। वह अपने दोस्तों के छोटे से ग्रुप के साथ ही रहती थी। कॉलेज पहुँचने पर उसकी सबसे अच्छी दोस्त नेहा गेट पर ही मिल गई।
“अरे मैडम, आज तो बहुत जल्दी आ गई,” नेहा ने मजाक करते हुए कहा।
दिव्या मुस्कुरा दी। “बस यूँ ही। वैसे आज कॉलेज में कुछ नया लग रहा है, पता नहीं क्यों।”
नेहा ने हँसते हुए कहा, “नया इसलिए लग रहा होगा क्योंकि आज हमारे कॉलेज में एक नई स्टूडेंट आ रही है। मैंने सुना है ट्रांसफर होकर आई है।”
दिव्या ने हल्के आश्चर्य से पूछा, “अच्छा? कौन है?”
“नाम तो अर्जुन बताया जा रहा है,” नेहा ने कहा।
दिव्या कुछ पल के लिए चुप हो गई। उसे समझ नहीं आया कि यह नाम सुनते ही उसके दिल की धड़कन क्यों तेज हो गई। उसने इस अजीब भावना को नजरअंदाज किया और दोनों क्लास की ओर बढ़ गईं।
क्लास शुरू हो चुकी थी। प्रोफेसर उपस्थिति ले रहे थे। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। पूरा क्लासरूम एक साथ दरवाजे की ओर देखने लगा। दरवाजा धीरे से खुला और अंदर एक युवक आया। उसकी आँखों में गहराई थी और चेहरा बेहद शांत, लेकिन उसकी मौजूदगी में एक अजीब सा आकर्षण था।
प्रोफेसर ने कहा, “आइए, अंदर आइए। स्टूडेंट्स, ये हैं अर्जुन। आज से ये हमारी क्लास का हिस्सा होंगे।”
अर्जुन ने हल्के से सिर झुकाकर सबको अभिवादन किया। उसकी नजर जैसे ही क्लास में घूमते हुए दिव्या पर आकर रुकी, समय जैसे एक पल के लिए ठहर गया। दिव्या को अचानक ऐसा लगा जैसे उसके भीतर कोई पुरानी याद जागने की कोशिश कर रही हो। उसने घबराकर अपनी नजरें झुका लीं।
अर्जुन धीरे-धीरे आगे बढ़ा और खाली सीट पर बैठ गया, जो संयोग से दिव्या की बेंच से दो सीट दूर थी। क्लास शुरू हो गई, लेकिन दिव्या का ध्यान बार-बार अर्जुन की ओर जा रहा था। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह इस अनजान लड़के की मौजूदगी से इतना असहज क्यों महसूस कर रही है।
दूसरी ओर, अर्जुन पूरी शांति से बैठा था, लेकिन उसकी नजरें बार-बार दिव्या की ओर चली जाती थीं। उसके भीतर कई वर्षों का इंतजार, दर्द और उम्मीद एक साथ उमड़ रहे थे। वह जानता था कि सामने बैठी यह लड़की वही आत्मा है, जिसे उसने सदियों पहले खो दिया था।
अर्जुन दरअसल कोई साधारण इंसान नहीं था। वह नागलोक का सम्राट नागार्जुन था, जिसने दिव्या को खोजने के लिए मानव रूप धारण किया था। वर्षों की खोज के बाद आखिरकार वह अपनी धरा तक पहुँच चुका था, लेकिन अब उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—दिव्या को सच बताए बिना उसकी रक्षा करना।
लंच ब्रेक में नेहा ने दिव्या को कैंटीन चलने के लिए कहा। दोनों वहाँ पहुँचीं तो देखा कि अर्जुन अकेला एक कोने में बैठा था। नेहा ने धीरे से दिव्या को कुहनी मारी और मुस्कुराकर बोली, “चलो, नई स्टूडेंट से मिलते हैं।”
दिव्या थोड़ी झिझकी, लेकिन नेहा उसे खींचकर वहाँ ले गई। नेहा ने उत्साह से कहा, “हाय, मैं नेहा और ये दिव्या।”
अर्जुन ने शांत मुस्कान के साथ कहा, “हैलो।”
उसकी आवाज सुनते ही दिव्या को जैसे किसी पुराने गीत की धुन सुनाई दी हो। उसने खुद को संभालते हुए कहा, “तुम यहाँ नए हो, पहले कहाँ थे?”
अर्जुन ने हल्के स्वर में जवाब दिया, “बस… अलग-अलग जगहों पर रहा हूँ। अब यहाँ पढ़ाई पूरी करनी है।”
उसके जवाब में एक गहराई थी, जैसे वह बहुत कुछ छुपा रहा हो। दिव्या को फिर वही अजीब सा एहसास हुआ, लेकिन वह समझ नहीं पा रही थी कि यह डर था या अपनापन।
बातचीत के दौरान अचानक कैंटीन के बाहर हलचल होने लगी। कुछ स्टूडेंट्स घबराकर बाहर देखने लगे। कॉलेज के गार्ड ने बताया कि गार्डन में एक बड़ा सांप दिखाई दिया है। यह सुनते ही कई स्टूडेंट्स डर गए।
दिव्या के हाथ अचानक काँपने लगे। उसे लगा जैसे उसके दिमाग में कुछ तस्वीरें चमकने लगी हों—हरी घास, चमकती हुई झील और एक सांप जो उसे देख रहा था। वह सिर पकड़कर बैठ गई।
अर्जुन ने यह सब देखा। वह तुरंत उठा और शांत स्वर में बोला, “तुम ठीक हो?”
दिव्या ने सिर हिलाया, लेकिन उसकी साँसें तेज हो गई थीं। उसी समय बाहर से खबर आई कि सांप अचानक गायब हो गया है, जैसे वह कभी था ही नहीं।
अर्जुन जानता था कि वह सांप कोई साधारण जीव नहीं था। नागलोक के रक्षक अक्सर उसके संकेत पर दिव्या की सुरक्षा के लिए आते थे। लेकिन उनका मानव लोक में इस तरह दिखना खतरे का संकेत भी हो सकता था।
क्लास खत्म होने के बाद दिव्या अकेली कॉलेज के गार्डन में बैठी थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि उसके साथ क्या हो रहा है। तभी अर्जुन धीरे से वहाँ आकर खड़ा हो गया।
कुछ पल दोनों के बीच खामोशी रही। हवा में हल्की ठंडक थी और पेड़ों की पत्तियाँ धीरे-धीरे हिल रही थीं।
अर्जुन ने धीरे से कहा, “तुम्हें साँपों से डर लगता है?”
दिव्या ने उसकी ओर देखा और बोली, “डर… पता नहीं। कभी-कभी लगता है जैसे उनसे कोई अजीब सा रिश्ता है।”
अर्जुन की आँखों में हल्की चमक उभरी। उसने मन ही मन महसूस किया कि धरा की आत्मा अब भी अपने अतीत से जुड़ी हुई है।
दिव्या ने अचानक पूछा, “तुम्हें ऐसा क्यों लगा कि मुझे साँपों से डर लगता है?”
अर्जुन कुछ पल चुप रहा। वह सच बताना चाहता था, लेकिन समय अभी सही नहीं था। उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “बस… अंदाजा लगा लिया।”
दिव्या ने उसकी आँखों में देखा। उन आँखों में उसे अजीब सा भरोसा महसूस हुआ, जैसे वह इस इंसान को बहुत पहले से जानती हो।
सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था। दोनों अलग-अलग रास्तों की ओर बढ़ गए, लेकिन दोनों के दिलों में एक नई हलचल शुरू हो चुकी थी।
दूसरी ओर, शहर की सीमा पर एक सुनसान खंडहर में काली ऊर्जा धीरे-धीरे आकार ले रही थी। कोई अदृश्य शक्ति जाग रही थी, जो दिव्या की वापसी को महसूस कर चुकी थी।
उस अंधकार में से एक धीमी आवाज गूँजी, जैसे कोई लंबे समय से इंतजार कर रहा हो—और अब खेल शुरू होने वाला था।